माँ तुम बहुत याद आती हो

माँ माँ तुम बहुत याद आती हो जब स्कूल से घर आती हूँ, खाली घर ही पाती हूँ सूनी सी देहरी देखती हूँ, अपनी थाली खुद लगाती हूँ, छोटे को भी कभी ख़िलाती हूँ , हर निवाले के साथ माँ तुम बहुत याद आती हो। आज जब मुझे लगा कि अब मैं भी बड़ी हो…

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THE SEA GETS TOGETHER ME

THE SEA GETS TOGETHER ME The sea gets together me with infinity. He untangles everyone heavy thoughts. They get dressed in my lunar room conceived destinies. And white sheets. I’m not looking for anyone’s consolation. Guardian of Fire send me One Creator. And the bright misfortune is house of my feelings vast. Rozalia Aleksandrova Writer…

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नर्तक

नर्तक वह मस्त होकर नाच रहा था। वह नटुआ नाच का अभ्यस्त लगता था. उसने हरे रंग की काँछ दार धोती और सिर पर पगड़ी पहनी थी जिसमें हरे तोते के पंख खोंसे गए थे। उसके शरीर का ऊपरी भाग नंगा था, लेकिन रंग बिरंगी मोतियों की माला और फूलों की माला से वह कुछ…

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क्यूँ बीत गया वो पल ……

क्यूँ बीत गया वो पल …… जिसके साथ जीने की लग गई थी लत, प्यारा ऐसे जैसे हो पिया का ख़त. जिसके लिए मोड़ दी हर सोच, लगा दी जान चाहे लगे लाख खरोंच . दे कर होठों को हँसी, बीत गया वो पल …… चाय के ख़ाली कप सी रह गई ज़िंदगी, समय इतना…

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प्रकृति हमारी अस्तित्व

प्रकृति हमारी अस्तित्व प्रकृति को प्यार दें स्नेह और दुलार दें, पूजा करें इसकी और तन मन भी वार दें! जिसने केवल आजतक देना ही जाना है, हम सभी मानव को संतान सी माना है!! फिर क्यूं हम भी पीछे हों अपने उदगार में, प्रकृति सी सुंदरता नहीं कहीं संसार में! उसके ही आंचल में…

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साइकिल

साइकिल “गौरी की माँ जरा पानी तो पिलाओ।” रामधर पसीने से तर-बतर थे,चेहरा गर्मी से लाल हो रहा था। “कुछ काम बना..?” रामधर ने एक सांस में पानी गले के नीचे उतार दिया और तौलिये से मुँह पोछने लगे। “जरा पंखा तेज कर दो..” मालती मशीन की तरह रामधर की हर बात का पालन करती…

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टिंगू

‘‘टिंगू’’ ‘‘मृदु….. देखो भई कौन है’’ इन्होंने मुझे नीचे के बरामदे से आवाज लगाई. सुबह का अखबार पढ़ते समय तनिक व्यवधान हो तो इनकी आवाज ऐसी ही रूखी हो जाती है. मैं सीढ़ियाँ फाँदती नीचे आई तो देखा कि एक बारह तेरह साल का लड़का साफ धुली हुई हाफ पैंट व टी-शर्ट पहने अपनी माँ…

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बेटा मजदूरिन का

बेटा मजदूरिन का एक बेटा मजदूरिन का, मुँह ना देखा था पिता का। दहलीज पर झोपड़ी के, था ,तरसता भूख से, तलाशती आँखों से माँ को, हर चेहरे को निहारती। थकी पलकों को सहला जाती, नींद अपने आँचल में। कभी जागता कभी सोता। ना जाने माँ कब आयेगी। सिने से लगायेगी, लाल को एक था…

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उठो पार्थ, अब साधो बाण

उठो पार्थ, अब साधो बाण   निवी चाय को उफनते देख रही थी। कभी गैस की आँच को कम कर देती तो अगले ही पल एक और उफ़ान देने के लिए गैस की आँच को तेज़ कर देती। उसके चेहरे का तनाव बता रहा था कि किसी गहरे सोच में डूबी हुई है। तभी बेटी…

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