आरज़ू तुम ज़िंदगी की

आरज़ू तुम ज़िंदगी की राज तुमको गर बता दूँँ क्या कहोगे, हाल दिल का मैं सुना दूँ क्या कहोगे। नाज़ है हमदम तुम्हारे उल्फ़त करम पर नर्म पलकों पर बिठा लूँ क्या कहोगे। इश्क़ में हो इम्तिहां क्या सब्र की भी, हर सितम हँस के उठा लूँ क्या कहोगे। चाँद तारों की तमन्ना है कहाँ…

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पगली

पगली धूप पड़ती थी तो पड़ती ही रहती थी जैसे उसको पड़ने का मशगला हो आया हो ,उसकी तपिश के विरोध में यहां-वहां से छायाएं निकल आती थी, मग़र उसे कभी छांव में नही देखा था, वो तपती धूप में भी उसी नल वाले चबूतरे के पास बैठी रहती थी, जिसके एक तरफ बहते पानी…

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स्वर्णिम लेखनी

स्वर्णिम लेखनी बहुत कठिन प्रश्न है यह कि मुंशी जी की कौन-सी रचना सर्वाधिक पसंद है और क्यों ?जिस लेखनी से कथा का अर्थ समझा व पढ़ने का सलीका आया वह है कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कलम। हर कहानी मन-मस्तिष्क पर अंकित। चाहे मजदूर हो या किसान, सूदखोर महाजन या खून चूसता जमींदार, सरकारी…

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पलाश

पलाश ’’माँ…….माँ ………. हमारे खेत की मुँडेर पर जो पेड़ लगे हैं उन पर कितने सुन्दर फूल आऐं हैं, देखा तुमने?” “वह तो हर साल आते हैं……. इन्हीं दिनों, होली के समय……… टेसू कहते हैं उसे….” “माँ….उन फूलों का रंग कितना सुन्दर है, गहरा पीला…नारंगी…….. कहीं कहीं काले धब्बे हैं पर माँ ऐसा लग रहा…

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एक वट वृक्ष : साहित्यकार शार्लेट ब्रोंटे

एक वट वृक्ष : साहित्यकार शार्लेट ब्रोंटे शार्लेट ब्रोंटे के जीवन संघर्ष को पढ़ते हुए अभिनेत्री मीना कुमारी की पंक्तियां स्मरण हो आईं … “टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली। जिसका जितना आंचल था उतनी ही सौगात मिली।।” अंग्रेजी क्लासिक साहित्य में शार्लेट ब्रोंटे का नाम उल्लेखनीय है। शार्लेट ब्रोंटे एक उपन्यासकर, कवयित्री और सामाजिक…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव

परमवीर-कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव हम कहते हैं आजादी हमें देश के नेताओं ने नागरिकों ने, क्रांतिकारियों ने, समाज सुधारकों ने, अहिंसा  के पुजारियों ने, अपना लहू बहाकर, तन-मन -धन न्योछावर करके दिलवाई है। लेकिन कभी हमने सोचा कि यह आजादी सदा यूँ ही बनी रहे,  अक्षुण्ण रहे और हमारे देश का तिरंगा नील गगन में…

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खोए अर्थ

खोए अर्थ ओ व्याकुल मन! चल ढ़ूंढते है, कबाड़ी के कोने से, वो रद्दी की गठरी, चल उड़ाते हैं गठरी पर जमे , यादों की धूल, उधेड़ते हैं गांठो को, शायद इसी में हो,, दीमक की चखी पुरानी, मटमैली पन्नों वाली डायरी , ओ व्याकुल मन! चल ढ़ूढते हैं, कुछ लिखे , कुछ कोरे कागज,…

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नर्तक

नर्तक वह मस्त होकर नाच रहा था। वह नटुआ नाच का अभ्यस्त लगता था. उसने हरे रंग की काँछ दार धोती और सिर पर पगड़ी पहनी थी जिसमें हरे तोते के पंख खोंसे गए थे। उसके शरीर का ऊपरी भाग नंगा था, लेकिन रंग बिरंगी मोतियों की माला और फूलों की माला से वह कुछ…

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