लौ बन कर मैं जलती हूँ
लौ बन कर मैं जलती हूँ दीपक बन जाएँ यादें पुरानी लौ बन कर मैं जलती हूँ दो हज़ार बाईस बस था जैसा भी था जैसे तैसे बीत गया कुछ अच्छा होने की आशा में ना जाने क्या क्या रीत गया पाँव पखारूँ अश्रू के गंगाजल से ,लो अब मैं चलती हूँ दीपक…
बड़े भाईसाहब
बड़े भाईसाहब प्रेमचंद जी की लिखी हुई यूं तो बहुत सी कहानियाँ हैं जो मुझे पसंद हैं जैसे ईदगाह, बड़े घर की बेटी, दो बैल, हार की जीत, बड़े भाईसाहब, पूस की रात, गरीब की हाय आदि। पर आज मैं “बड़े भाईसाहब” के बारे में यहाँ बताना चाहूंगी। “बड़े भाईसाहब”, कहानी दो भाइयों के बीच…
होली पर आओ कान्हा
होली पर आओ कान्हा नर है वो मनमाना, होली का करे बहाना, होली के बहाने से वो,डाले कुड़ियों को दाना।। रंग ले अबीर ले और साथ में है भाँग छाना, मनमौजी छैला है, वो बातों में न कोई आना होली की मादकता में उसका न कोई सानी, गुलाल की आड़ में वो कर रहा मनमानी।।…
दिव्या जी को जितना मैंने जाना
दिव्या जी को जितना मैंने जाना मिलना मिलाना कहते हैं ईश्वर के हाथों का खेल है और जीवन के किस मोड़ पर किसी ऐसी शख्सियत से भेंट करवा दें कि लगे जैसे आपको तो बहुत पहले से जानते हैं| प्रवासी हिंदी साहित्य लेखन की प्रतिनिधि साहित्यकार जिनका रचना संसार बहुआयामी है, सुश्री दिव्या माथुर जी…
कोरोना और पर्यावरण
कोरोना और पर्यावरण : एक अवसर या सौगात इस कोरोना काल में भविष्यत: महात्मा गाँधी की कही दो बातें बहुत ही स्मरणीय हैं। एक यह, कि जो बदलाव तुम दूसरों में देखना चाहते हो वह पहले खुद में लाओ। दूसरा कथन तो शायद पहले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है – वह यह कि संसार में…
सावन महोत्सव
विजया गार्डन में वीमेंस ग्रुप द्वारा 2 अगस्त को विजया गार्डन क्लब हाउस में सावन महोत्सव का प्रोग्राम रखा गया जिसमें सावन क्वीन प्रतियोगिता एवं विभिन्न प्रकार के गेम, गीत-संगीत का आयोजन किया गया ।कार्यक्रम का संचालन अंजली और श्वेता पटनायक ने किया।वहीं जज की भूमिका में जिला परिषद अध्यक्ष बुलू रानी सिंह, संपादक अर्पणा…
सम्पादकीय
सम्पादकीय सर्वप्रथम गृहस्वामिनी के सुधी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं । ‘गतवर्ष के तजुर्बात हों ,उत्कर्ष में विश्वास हो , गतवर्ष तो एक अंत है,नव वर्ष शुभ शुरुआत हो।’ यह गृहस्वामिनी का आज़ादी विशेषांक है अतः आज़ादी पर ज्ञानवर्धक आलेख एवं सुन्दर कविताओं से यह अंक सुसज्जित है ,और हो भी क्यों न…
साथी हाथ बढ़ाना !
साथी हाथ बढ़ाना ! श्रमिक हमारी सभ्यता-संस्कृति के निर्माता भी हैं और वाहक भी। हजारों सालों तक मनुवादी संस्कृति ने उन्हें वर्ण-व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर रखा। उन्हें शूद्र, दास और अछूत घोषित कर उनके श्रम को तिरस्कृत करने की कोशिश की गई। सामंती व्यवस्था ने गुलाम और बंधुआ बनाकर उनकी मेहनत का शोषण…