तुम स्वयं उपमान हो

माँ! मेरे यह गीत सारे,आज तुझको हैं निवेदित
मन के मेरे भाव निर्मल,तेरे चरणों में हैं प्रेषित
शीत की ऊष्मा हो माते और हवा सा प्यार हो
स्नेह का सागर समेटे, तुम दैवीय उपहार हो

जो मेरा जीवन है गुंजाता,तुम वो अनहद गान हो
क्या तुम्हें उपमा मै दूँ माँ,तुम स्वयं उपमान हो

जीवनशाला का ककहरा, माँ , तेरे आँचल में पढ़ा
निज क्षीर से सींचा था तुमने,वृक्ष उन्नत अब खड़ा
शीतल ओ’ कोमल तुम्हीं,तुम ही दुर्गा का अवतार हो
जो पार भव सागर करा दे, तुम वही पतवार हो

बाधाओं को रोकती तुम बन अटल चट्टान हो
क्या तुम्हें उपमा मैं दूँ माँ , तुम स्वयं उपमान हो

मन मंजूषा में तेरी माँ, त्याग के मोती जड़े
लाल हित तूने सदा जप तप सभी व्रत भी करे
कोटि सूर्य समप्रभ किरण सी ,तेज तुम असाध्य हो
पूजूँ भला क्यों ब्रह्म विष्णु,तुम ही मेरी आराध्य हो

शुचित कर्मो से जो अर्जित, पुण्य का प्रतिदान हो
क्या तुम्हें उपमा मैं दूँ माँ ,तुम स्वयं उपमान हो

डॉ निधि अग्रवाल
साहित्यकार
झांसी, उत्तर प्रदेश

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