भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- प्रोफेसर यशपाल

प्रोफेसर यशपाल- स्काई लैब अंकल

किसी भी देश अथवा जाति के लिए आजादी बहुत महत्वपूर्ण होती है। एक आजाद देश ही अपना विकास, अपने नागरिकों का सही अर्थों में उन्नयन उनकी आवश्यकताओं तथा अपेक्षाओं के अनुरूप कर सकता है।
लगभग 200 वर्षों तक गुलाम रहने के बाद हम आजाद हुए थे। यह आजादी कठिन संघर्षों ,लोगों के त्याग और अनगिनत बलिदानों से ही संभव हो पाया था।
ब्रिटिश गुलामी से हम आजाद हो गए थे ,परंतु यह तो सिर्फ राजनीतिक आजादी थी। भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा और औद्योगिक पिछड़ेपन से आजादी तो अभी बाकी थी। आजादी का मतलब सिर्फ शासन की बागडोर अपने हाथों में ले लेना ही नहीं होता ,बल्कि आजादी का उद्देश्य देश का विकास और निर्माण ,देश की जरूरतों और लोगों के अपेक्षाओं के अनुरूप करना होता है।
साथ ही उस आजाद देश को अपनी सुरक्षा स्वतंत्रता और निर्माण की गति को भी बनाए रखना होता है अन्यथा कोई भी देश सही अर्थों में आजाद नहीं रह सकता।
इन सबके लिए विज्ञान तथा तकनीकी का भी उन्नयन और विकास अनिवार्य है। आजाद भारत के लोगों ने विज्ञान और तकनीकी के महत्व को समझा। इस दिशा में भागीरथ प्रयत्न शुुरु हुआ। पंचवर्षीय योजनाएं बनी जिसके तहत इस्पात ,अल्मुनियम ,तांबे आदि धातुओं के साथ बिजली एवं इलेक्ट्रॉनिक आदि कई प्रकार के कारखाने खुले। देश औद्योगिक विकास के रास्ते पर चल पड़ा ।प्रारंभ में इनके लिए हम पूरी तरह विदेशों पर निर्भर थे। विदेशी निर्भरता कम करने के लिए देश में ही विज्ञान तथा तकनीकी के विकास के लिए उच्च स्तरीय संस्थानों की स्थापना की गई। देश की जरूरतों के अनुरूप विज्ञान तथा तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों के लिए दर्जनों प्रयोगशालाएं तथा अनुसंधान संस्थाएं खोली गई।’इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन’ तथा ‘एटॉमिक रिसर्च केंद्र’ के साथ भारत ने नए क्षेत्रों क्रमशः अंतरिक्ष अनुसंधान तथा न्यूक्लियर विज्ञान के क्षेत्र में कदम रखा। जिसके फलस्वरूप आजादी के मात्र 15 वर्षों के भीतर ही भारत एटम बम बनाने मे सफल हो गया।
इस अनुसंधान संस्थाओं को क्षमता प्रदान करने की दिशा में तथा उन्हें सही ढंग से संचालित करने में डॉक्टर भाभा ,विक्रम साराभाई ,डॉक्टर धवन आदि जैसे कई वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की इन्हीं में एक नाम प्रोफेसर यशपाल का है। प्रोफेसर यशपाल दूरगामी दृष्टि रखने वाले प्रगतिशील विचार धारा वाले युवा वैज्ञानिक थे।विज्ञान के महत्व को समझते हुए वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों को आधुनिक एवं सक्षम बनाने तथा शिक्षा को विज्ञान एवं समाज से जोड़कर तथा और बेहतर बनाने का प्रयास किया तथा सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में प्रोफ़ेसर यशपाल ने भारत के राजनीतिक नेतृत्व को वैज्ञानिक बोध और परामर्श देने का भी कार्य किया। विज्ञान को राष्ट्रीय सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति समर्पित करने की एवं देश को वैज्ञानिक सोच की ओर अग्रसर करने का प्रयास किया, जो देश के वैचारिक सामाजिक प्रौद्योगिकी एवं आधुनिकीकरण के लिए बहुत जरूरी था।

इस महान वैज्ञानिक का जन्म 26 नवंबर 1926 में पंजाब प्रांत में चेनाब नदी के पूर्वी तट पर बसे झांग शहर, (अब पाकिस्तान में ) में हुआ था ।इनके पिता राम प्यारे लाल जी अंग्रेजी शासन काल में बलूचिस्तान के क्वेटा शहर में सरकारी पद पर कार्यरत थे। इनकी माता लक्ष्मी देवी घरेलू महिला थी। प्रोफेसर यशपाल ने अपनी शादी अपनी दोस्त निर्मल से 1954 में की। इनके दो बेटे हुए राहुल और अनिल ।
प्रोफेसर यशपाल की प्रारंभिक शिक्षा क्वेटा में ही हुई थी ।इसके बाद इनके पिता का तबादला जबलपुर में हो गया।और तब यशपाल भी अपने पिता के साथ जबलपुर आ गए। जहां से इन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की। इस समय स्वतंत्रता की लड़ाई अपने चरम पर थी। गांधीजी और स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में जब यशपाल बातें और कहानियां सुनते तो उनके मन में भी इन लोगों के लिए सदा आप देश के लिए कुछ करने की इच्छा प्रबल होती।1947 में आजादी मिलने के बाद जब देश का बंटवारा हुआ तो यशपाल ने भारत मे ही रहना पसंद किया ।
यशपाल के जीवन पर उनके स्कूल के एक शिक्षक ‘पवार’ का गहरा प्रभाव पड़ा ‘पवार’ लीक से हटकर अध्यापन का कार्य करते ।पढ़ाने के क्रम में वे परंपरागत व्याख्यान शैली का अनुसरण न करके विद्यार्थियों के साथ चर्चा करके, तर्क वितर्क करके अवधारणाओं को स्पष्टता से समझाते। यशपाल के बाल मन पर इस शिक्षण शैली का बहुत गहरा असर पड़ा और यहीं से उनके जीवन में हर चीज को देखने ,सोचने और समझने के नजरिया में फर्क पड़ने लगा।
प्रोफेसर यशपाल ने अपनी बीएससी ऑनर्स की पढ़ाई 1945 से 1947 तक लाहौर कैंपस अविभाजित पंजाब से पूरी की।इसी यूनिवर्सिटी से 1949 उन्होंने भौतिकी से एम .एससी .की डिग्री भी हासिल की। इसके बाद वे पीएचडी की डिग्री के लिए बोस्टन संयुक्त राज्य अमेरिका गये और 1958 में उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से भौतिकी में पीएचडी की उपाधि हासिल की। इसके उपरांत प्रोफ़ेसर यशपाल मुंबई आए और टाटा इंस्टीट्यूट फंडामेंटल रिसर्च में वैज्ञानिक
के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की। यहां उन्होंने कॉस्मिक किरणों यानी (ब्रह्मांडीय विकीरणो )पर विशेष अध्ययन किया, जिसके लिए इन्हें पूरी दुनिया मे ख्याति प्राप्त हुई।
इसी समय अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई की देखरेख में अंतरिक्ष कार्यक्रम पर बड़ी सक्रियता से काम चल रहा था ।लक्ष्य था भारत के गांव-गांव में टेलीविजन कार्यक्रम के प्रसारण को पहुंचाना परंतु उसी समय साराभाई का आकस्मिक निधन हो गया। साराभाई की जगह अंतरिक्ष आयोग का अध्यक्ष वैज्ञानिक सतीश धवन जी को बनाया गया। साराभाई ने जो सपने देखे थे उस सपने को साकार करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने1972 मे अपनी एक इकाई ‘स्पेस एप्लीकेशन सेंटर’ (SAC) की स्थापना अहमदाबाद में की , जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष कार्यक्रम के अनुप्रयोग से देश के आम लोगों को लाभ पहुंचाना था। इस कार्य के लिए ‘सेटेलाइट इंस्ट्रक्शन टेलीविजन एक्सपेरिमेंट’ कार्यक्रम की शुरुआत की गई । सतीश धवन ने इस कार्यक्रम के लिए प्रोफ़ेसर यशपाल को आमंत्रित किया यशपाल इसके प्रथम निदेशक बने और निदेशक के जिम्मेदारी को बखूबी निभाया ।एक हजार से ज्यादा लोगों के टीम की अगुवाई करते हुए यशपाल अपने जी-जान से दिन रात लगे रहे।जिसका परिणाम सन 1975-1976 के दौरान विश्व के सबसे बड़े समाजशास्त्रीय परीक्षण के रूप में सामने आया इस परीक्षण से 6 राज्यों के दूरदराज के चौबीस सौ गांवों के करीब-करीब दो लाख लोगों को विकास आधारित कार्यक्रमों का लाभ पहुंचा। एक वर्ष के अंदर ही 50,000 प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया।
इस प्रकार प्रोफेसर यशपाल ने भारत में सेटेलाइट इंस्ट्रक्शन टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) की नीवं रखी। उपग्रह का देश में शिक्षा संचार और विकास के लिए व्यापक रूप से उपयोग कर दुनिया को यह दिखला दिया कि संचार माध्यम का उपयोग शिक्षा एवं ज्ञान के प्रसार में कैसे और कितनी क्षमता से किया जा सकता है । लोग अब घर बैठे टीवी पर मनोरंजन से लेकर शिक्षा, कृषि ,पशुपालन तथा स्वास्थ पर आधारित ज्ञान वर्धक कार्यक्रम देखने लगे। दुनिया भर के वैज्ञानिकों एवं शिक्षाविदों ने इस प्रयोग के सामाजिक महत्व की काफी प्रशंसा की। यह विश्व का अपने तरह का पहला परीक्षण था ।प्रोफेसर यशपाल के इस उपलब्धि से प्रभावित होकर 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ के तात्कालिक महासचिव “जेवियर पेरेज डे कएलर “ने उन्हें ‘UNI SPACE -।।’ मे भाग लेने के लिए आमंत्रित किया ।इस प्रकार प्रोफेसर यशपाल वियना (ऑस्ट्रिया) मे आयोजित इस सम्मेलन में भाग लेकर भारत के शान को बढ़ाया।
प्रोफ़ेसर यशपाल का आम जनता के बीच अपनी बातों को रखने का खास अंदाज था।वे गुढ वैज्ञानिक रहस्यों, विज्ञान की गुुत्थियोंं को बड़ी सरलता से आम लोगों को आम बोलचाल की भाषा में समझाने की कोशिश करते जिसके कारण वे लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गये थे। इन्होने टी .वी के कई विज्ञान आधारित शैक्षणिक कार्यक्रमों और सीरियलों को भी होस्ट किया जो बहुत चर्चित और लोकप्रिय हुआ। दूरदर्शन पर इनके द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम टर्निंग प्वाइंट ने रोचक 150 एपिसोड पूरे किए। उनका यह कार्यक्रम काफी सराहा गया,बच्चों को यह प्रोग्राम इतना पसंद था ,कि अगले एपिसोड का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते।बच्चों के बीच प्रोफेसर यशपाल ” स्काई लैब अंकल “के नाम से मशहूर हो गए थे। देश भर के छात्रों और बुद्धिजीवी लोगों द्वारा भेजे गये विज्ञान के सवालों का वे सरल शब्दों में जवाब देते । इसके अतिरिक्त ‘रेस टू सेव द प्लानेट’, ‘भारत की छाप’ , ‘तर रम तू’ तथा ‘मानव के विकास’ आदि कई टीवी सीरियलो के माध्यम से विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के महत्व को इन्होंने समझाया। इस प्रकार टेलीविजन के जरिए विज्ञान के प्रचार प्रसार मे प्रोफेसर यशपाल ने महत्वपूर्ण योगदान किया। 1990 में वे ‘भारत- जन- विज्ञान जत्था ‘ के साथ जुड़कर विज्ञान संचालक के रूप में भी कार्य किया ।इसके साथ ही ‘ एनसीएससी नेटवर्क’ के महत्वपूर्ण कार्यक्रम ‘राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस’ के साथ भी जुड़े और अपने अनुभव का भरपूर सहयोग दिया।
एक टीवी कार्यक्रम के दौरान प्रोफेसर यशपाल ने सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण के विषय में जानकारी देते हुए अंधविश्वासों पर रोचक टिप्पणियां दे कर देश में फैले अंधविश्वासों पर खुलकर चोट किया और लोगों को तर्क और वैज्ञानिक सूझबूझ से अवगत कराया ।इसी सिलसिले में मुझे एक बात याद आ रही है 21 सितंबर 1995 आज से लगभग 27 वर्ष पूर्व भारतवर्ष में अचानक एक चमत्कार की अफवाह फैली थी, कि गणेश जी की मूर्तियां दूध पी रहीं हैं। पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी लोग भी इसे भगवान का चमत्कार मान रहे थे ।परंतु उसी समय टीवी पर लाइव आकर प्रोफेसर यशपाल ने इसका खंडन करते हुए यह बताया था कि यह कोई चमत्कारिक घटना नहीं है बल्कि इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण “पृष्ठ तनाव” है।
प्रोफेसर यशपाल एक महान वैज्ञानिक के साथ एक उच्च कोटि के शिक्षाविद भी थे। उनका मानना था कि शिक्षा अगर वैज्ञानिक सूझबूझ के साथ दी जाए तो जीवन ज्यादा बेहतर और सफल होता है। वे कहा करते थे अगर विज्ञान शिक्षा और समाज के बीच एक सकारात्मक तालमेल बना दिया जाए और लोगों के जिज्ञासा को शांत कर दिया जाए तो कोई भी व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ सकता है ।और इससे देश में प्रगति लाई जा सकती है। उन्होंने वैज्ञानिक समझ के साथ शिक्षा को और प्रभावशाली बनाने का सुझाव दिया । विज्ञान को जन- जन तक ले जाकर और उसे जनता के साथ जोड़ने का प्रयास वे जीवन भर करते रहें।
विज्ञान को बढ़ावा देने और उसे लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हे 2009 में यूनेस्को कलिंगा सम्मान से नवाजा। यह पुरस्कार विज्ञान संचार के क्षेत्र का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
प्रोफ़ेसर यशपाल विज्ञान के महत्ता को समझते थे ।इसलिए विज्ञान के प्रचार और प्रसार में सर्वदा सक्रिय रहे ।उनके इस योगदान को देखते हुए “विज्ञान प्रसार” ने यशपाल के 80 वर्ष की आयु पूरी होने पर उनके सम्मान में उनके जीवन पर एक पुस्तक “यशपाल अ लाइफ इन साइंस” का प्रकाशन किया।

प्रोफेसर यशपाल तात्कालिक शिक्षा प्रणाली से बहुत संतुष्ट नहीं थे। वे चाहते थे कि पाठ्यक्रम को कैसे आम लोगों की वास्तविक जरूरत से जोड़ा जाए इसलिए जब जब उन्हें शैक्षणिक जिम्मेदारी के लिए योजना बनाने का काम सौंपा गया तो उन्होंने शिक्षा को बेहतर बनाने केलिए अपने सुझावों को बडी सिद्दत के साथ रखा ।


प्रोफ़ेसर यशपाल के प्रतिभा से प्रभावित होकर भारत सरकार ने उन्हें
— 1983-84 में योजना आयोग का मुख्य सलाहकार नियुक्त किया।
–1984से1986 तक भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय में सचिव पद पर रहे
— 1986से1991 तक ये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी )के चेयरमैन के पद पर रहे। इन्होंने चेयरमैन के जिम्मेदारी को एक चुनौती की तरह लिया ।इस पद पर आसीन होने के बाद प्रोफेसर यशपाल ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन के लिए कई अहम फैसले लिए। उच्च शिक्षा के लिए कई नियम बनाएं। जिसमें वैज्ञानिक मानसिकता ,अकादमीक स्वाधीनता तथा स्वायत्तता को प्रमुखता देते हुए शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए उन्होंने कई कार्यक्रमों की शुरुआत की ।

विश्वविद्यालय में शोध को बढ़ाने के लिए इन्होंने अंतर विश्वविद्यालय केंद्र स्थापित करने की वकालत की।आगे चलकर प्रोफेसर यशपाल के द्वारा इन्हीं सुझावों पर आधारित पुणे मे ‘यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्राॅनोमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स’ (IUCAA)की स्थापना हुई। जो खगोल भौतिकी के क्षेत्र में अनुसंधान एवं इसे लोकप्रिय बनाने के लिए कार्य कर रहा है

दूसरा नई दिल्ली में ‘इंटर यूनिवर्सिटी एक्सीलरेटर सेंटर’ जो नाभिकीय अनुसंधान के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में कार्य कर रहा है एवं तीसरा ‘इंफॉर्मेशन एंड लाइब्रेरी नेटवर्क’ (इंफ्लिबनेट) जो विभिन्न विश्वविद्यालयों के लाइब्रेरीओं को जोड़कर ज्ञान के आदान प्रदान को सुलभ करतां है।
एक और महत्वपूर्ण काम यशपाल जी ने यह किया कि उन्होंने कई प्रयोगशालाओ और संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा देकर वहां अनुसंधान तथा ज्ञान के आदान-प्रदान को सुविधाजनक बना दिया।

— स्कूली शिक्षा में बच्चों पर बोझ कम करने के लिए भारत सरकार द्वारा 1993 में गठित कमेटी के अध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर यशपाल ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के लिए कई सुझाव दिए तथा आनंददाई शिक्षा की अवधारणा की सिफारिश की।


प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में बनी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या कार्यक्रम 2005 एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसमें ग्रेड प्रणाली एवं परीक्षा को तनाव मुक्त करने की सिफारिशें थी। 1966 में कोठारी कमीशन ने जिस कॉमन स्कूल की अनुशंसा की थी, प्रोफेसर यशपाल उसके समर्थक थे।
2007 से 2012 तक प्रोफेसर यशपाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे ।अपने कार्यकाल में इन्होने विश्वविद्यालय को सक्षम और सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया।
प्रोफेसर यशपाल विदेशों की कई संस्थाओं तथा ‘यू. एन. एडवाइजरी कमिटी ऑन साइंस एंड टेक्नोलॉजी फॉर डेवलपमेंट’, ‘साइंटिफिक इंटरनेशनल सेंटर फॉर थ्योरिटीकल फिजिक्स’ तथा ‘यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी’ जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भी जुड़े हुए थे। 1981 में अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण इस्तेमाल पर संयुक्त राष्ट्र संघ के दूसरे सम्मेलन के भी महासचिव रहे।
प्रोफेसर यशपाल को एक साहसी शिक्षाविद के रुप में भी जाना जाता है। इन्होंने छत्तीसगढ़ के फर्जी विश्वविद्यालय को बंद कराने का ऐतिहासिक मुकदमा भी लड़ा। बात 2002 की है। छत्तीसगढ़ की सरकार ने एक कानून पारित कर 112 प्राइवेट यूनिवर्सिटी को मान्यता दे दी थी। यह यूनिवर्सिटी छोटे-मोटे निजी कॉलेज से मोटा मुनाफा कमाने के लिए खोली गई थी । पूरे देश में इसकी चर्चा होने लगी थी प्रोफेसर यशपाल में सुप्रीम कोर्ट में इसके विरुद्ध एक याचिका दायर की और उस कानून को रद्द करने की मांग की जिसके तहत निजी विश्वविद्यालय बनाने का फर्जीवाड़ा चल रहा था। मुकदमे से जुड़ा हर छोटा बड़ा काम उन्होंने खुद किया आंकड़े जुटाए दलीले तैयार की तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरसी लाहोटी के तीन सदस्य पीठ ने याचिका स्वीकार किया और जांच के उपरांत ऐसे 112 फर्जी निजी विश्वविद्यालय को भंग करने का फैसला सुनाया इसके साथ ही उन्होंने देश में फैले कोचिंग तंत्र को भी खत्म करने की अनुशंसा की । वास्तव में प्रोफेसर यशपाल बच्चों की शिक्षा के लिए अति संवेदनशील और चिंतित रहते थे।

वे वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजने के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि जिस तरह अमेरिका के वैज्ञानिक स्वयं परिश्रम करके सीखते हैं उसी तरह भारत के वैज्ञानिकों को भी खुद प्रयास करके सीखना चाहिए।
प्रोफेसर यशपाल को 2009 में मानव संसाधन मंत्रालय ने उच्च शिक्षा में सुधार और विकास के लिए गठित समिति का चेयरमैन बनाया। इस समिति के रिपोर्ट के पहले अध्याय को देखने से ही प्रोफेेसर यशपाल के उच्च शिक्षा के प्रति विचार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं इसमें कहा गया है कि “विश्वविद्यालय वह स्थान है जहां नए विचारों के बीज अंकुरित होते हैं, जड़े पकड़ते हैं और लंबे व तगड़े बनते हैं यह ऐसी अनोखी जगह है ,जहां रचनात्मक दिमाग मिलते हैं, एक दूसरे से संवाद करते हैं, और नई वास्तविकतओं के लिए भविष्य का रास्ता बनाते हैं। आज विश्वविद्यालयों की जो स्थिति है, उस के संदर्भ में हमें उनके विचार ज्योतिपुंज की तरह रास्ता दिखाते नजर आते हैं।

पुरस्कार और सम्मान

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाजा गया:—–

* 1976 में भारत सरकार द्वारा विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में उल्लेेखनिय योगदान के लिए पद्मभूषण।

* 1980 में अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मारकोनी फैलोशिप ।

* 1987 में इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन का प्रतिष्ठित जी.पी. चटर्जी
मेमोरियल अवॉर्ड।

*2000 में विज्ञान के क्षेत्र में विशेष
उपलब्धि के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार।

* 2006 में विज्ञान के क्षेत्र में विशेष उपलब्धि के लिए मेघनाथ साहा पुरस्कार।

* 2009 में यूनेस्को द्वारा विज्ञान को पॉपुलर बनाने के लिए उन्हें कलिंगा पुरस्कार।
* 2011 में लाल बहादुर शास्त्री पुरस्कार फॉर एक्सीलेंस इन एकेडमिक एंड मैनेजमेंट के क्षेत्र मे।

* 2013 मे देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण ।

ज्योत्स्ना अस्थाना
भारत

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