विरोधाभास की विलक्षणता: दिव्या माथुर

विरोधाभास की विलक्षणता: दिव्या माथुर

जब पहली बार वातायन से जुड़ने वाली थी तो दिव्या जी से बात हुई, शब्दों में खरापन और स्नेह दोनों एक साथ थे, और ऐसा बहुत कम होता है।वैसे दिव्या जी के कई गुण हैं जो परस्पर विरोधाभास लिए प्रतीत होते हैं पर बहुत ही सरलता से उनमें समाहित हैं,चाहे वो बच्चों सरीखा उत्साह हो या बड़ों सरीखी कर्मठता, हर काम को शुरू करने के पहले वाली घबराहट हो या उसको सर्वोत्कृष्ट करने की दृढ़ता, नियमों के प्रति उनका अनुशासन हो या नया सिखाने में उनकी उदारता! दिव्या जी ऐसी ही हैं, तभी तो विविध पृष्टभूमि से आए, हर उम्र, क्षेत्र या विचारधारा वाले लोगों से वो जुड़ पाती हैं।

यूं तो दिव्या जी, और वातायन के साथ मेरा जुड़ाव बहुत लंबा नहीं है पर गहरा ज़रूर है इसमें एक दूसरे को खुश करने वाला दिखावटी सतही आडंबर नहीं है, दिव्या जी बड़ी बेबाकी से मेरी गलतियां बताती भी हैं और उसे बेहतर करने के रास्ते भी सुझाती है। उनकी पारखी नज़र साहित्य तक ही सीमित नहीं, उसमें कला और संगीत की भी गहरी समझ है! यही नहीं, जीवन के बारे में भी हर गूढ़ बात को वो इतना सरल कर के समझाती हैं कि फिर हर मुश्किल आसान लगती है!

दिव्या जी को अपनी प्रशंसा पसंद नहीं अपितु उन्हें अच्छा काम अधिक आनंदित करता है, इसलिए अपनी फेहरिस्त को यहीं समेटूंगी। प्रार्थना करूंगी कि दिव्या जी को ईश्वर लंबी आयु और अच्छा स्वास्थ्य दें और वे ऐसे ही हम सबमें अपने ज्ञान और अनुभव के मोती बांटते रहें!

आस्था देव

कवियत्री, लेखिका, प्रस्तोता और आईटी प्रोफेशनल

 

 

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