हिंदी है हम

हिंदी है हम

हिंदी को प्रायः भाषा मात्र समझने की भूल न जाने हम क्यों कर लेते हैं जबकि हिंदी तो भारत की चिंतन धारा का मूल है । इस बात से सभी सहमत हैं जो लोग अपनी मातृभाषा और मातृभूमि को यथोचित सम्मान नहीं देते उन्हें जीवन में पर्याप्त परिश्रम करने के बाद भी उचित सम्मान नहीं मिलता। महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के शब्दों में —

निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल ।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल ।।

संचार माध्यमों के अनुसार
भारत की तीन चौथाई से भी अधिक जनसंख्या द्वारा बोली और समझी जाने वाली है हिंदी भाषा । विश्व के 50 से भी अधिक देशों में हिंदी का अध्ययन और अध्यापन विशेष रूप से होता है । आज विश्व में हिंदी भाषियों की संख्या तीसरे से दूसरे स्थान पर पहुंचने वाली है । 93% युवा यूट्यूब पर हिंदी में ही वीडियो देखते हैं। 95% पंजाबी भाषियों के बीच हिंदी लोकप्रिय है और 95 . 5% गुजराती भी हिंदी ही बोलते हैं । 94% की दर से डिजिटल वर्ल्ड में हिंदी सामग्री की दर बढ़ रही है । 25% से अधिक भारतीय हिंदी में ही इंटरनेट सामग्री का उपयोग करना चाहते हैं । ऐसे व्यापक आधार वाली हिंदी भाषा को राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर उसका जायज़ स्थान दिलाने हेतु एक सशक्त और सार्थक प्रयास हम ईमानदारी से करें । हिंदी की स्वीकार्यता और उसके विस्तार को बढ़ाने के लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम राष्ट्रीय स्तर पर प्रादेशिक भाषाओं – बोलियों के शब्दों को आवश्यकतानुसार अपनी बोलचाल की भाषा में हिंदी भाषा के साथ सम्मिलित करें इस प्रकार हिंदी भाषा अधिक समृद्ध होगी । अंग्रेजी भाषा के शब्दों के प्रयोग का मोह छोड़ें । अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए अच्छा है कि अधिक से अधिक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करें , उन्हें यथोचित सम्मान दें , किंतु इसके कारण हिंदी के सम्मान में कोई कमी न हो , इस बात का विशेष ध्यान रखें ।

वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार – प्रसार में अप्रवासी भारतीयों जिनमें साहित्यकार , कलाकार , चिकित्सक , वैज्ञानिक, व्यापारी, शिक्षक तथा अन्य कामगार सम्मिलित हैं , का योगदान तो है ही , इसके साथ ही दूरदर्शन तथा सिनेमा के कार्यक्रमों ने भी इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है । किंतु जो कमी विशेष रुप से अखरती है वह है कि हम संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को वह सम्मानजनक स्थान नहीं दिला पाए जिसकी वह सर्वथा अधिकारी है और इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं , क्योंकि जनगणना के समय और यहां तक कि अधिकांश शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों से भी उनके आवेदन पत्रों में भाषाई जानकारी मांगते समय उन्हें प्रांतीय भाषाओं – बोलियों जैसे ब्रज, मैथिली , राजस्थानी, अवधी , बुंदेलखंडी , हिमाचली आदि के विकल्प दिए जाते हैं , जबकि इन भाषाओं के स्थान पर हिंदी भाषा का ही प्रयोग हो , तो संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी भाषियों के जो आंकड़े पहुंचेंगे वे निश्चित रूप से यह सिद्ध करेंगे कि हिंदी भाषियों की संख्या अधिक है
और इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को स्थान दिलाने का भारत का दावा पुख्ता होगा ।

हिंदी के समुचित प्रचार प्रसार के उद्देश्य को ध्यान में रखकर सन 1975 में भारत के नागपुर नगर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें हिंदी की दशा और दिशा पर विचार मंथन कर समय-समय पर विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया गया, *तदनुरूप मॉरीशस (1976) , दिल्ली ( 1983), मॉरीशस (1993), त्रिनिदाद एवं टोबैगो (1996 ), लंदन (1999 ), सूरीनाम (2003 ), न्यूयॉर्क (2007 ), जोहान्सबर्ग (2012 ), में और 10 से 12 सितंबर 2015 को भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी के विस्तार से जुड़े विभिन्न विषयों पर अनेक सत्रों में गहन विचार विमर्श किया गया* , जिनमें से कुछ बिंदुओं का यहाँ उल्लेख करना अधिक उचित होगा जैसे –
देश की अन्य भाषाओं के सरल शब्द हिंदी में सम्मिलित करें ।
हिंदी को लोक गामी बनाया जाए ।
हिंदी की शक्ति और सामर्थ्य से विश्व को परिचित कराते रहें ।
संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिंदी का अधिक प्रयोग करें ।
भारतीय विदेश नीति में हिंदी का अधिकतम प्रयोग हो।
राजनीतिक इच्छाशक्ति भी निर्णायक हो ।
हिंदी का सरलीकरण होता रहे ।

भोपाल के पश्चात मॉरीशस में 18 से 20 अगस्त 2018 में संपन्न 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में विश्व के 20 से अधिक देशों के लगभग 350 हिंदी सेवियों के साथ ही इस लेख की लेखिका .. उर्मिला देवी उर्मि .. को भी सहभागिता का सुनहरा अवसर मिला सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में भारत की विदेश मंत्री माननीया सुषमा स्वराज जी के उद्बोधन में यह सुनकर सुखद अनुभूति हुई कि अब संयुक्त राष्ट्र संघ के समाचार प्रभाग से हिंदी भाषा में समाचारों का प्रसारण नियमित रूप से होने लगा है इसी सम्मेलन के मंच पर संयुक्त राष्ट्र संघ के हिंदी समाचार बुलेटिन को सुनना देखना मेरे साथ ही सम्मेलन में उपस्थित सभी हिंदी सेवियों के लिए गर्वानुभूतिकारक रहा और इस घटना के कारण यह विश्वास अधिक दृढ़ हुआ कि हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु विश्व भर में हो रहे प्रयासों को अब और अधिक बल मिलेगा ।

संसार की श्रेष्ठ साहित्य की हिंदी में उपलब्धता हिंदी की स्वीकार्यता का प्रमाण है । हिंदी प्रेमियों के लिए यह समझ लेना और स्मरण रखना नितांत आवश्यक है संस्कृत में 2200 धातुएं है जिन से बनने वाले शब्दों की संख्या डेढ़ करोड़ तक जाती है लगभग उतनी ही संख्या हिंदी में भी है जबकि अंग्रेजी के शब्द भंडार में डेढ़ लाख शब्द है हिंदी के वर्णों और शब्दों को जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा और बोला जाता है अतः गर्व के साथ कहें हिंदी शुद्ध , सुदृढ़ वैज्ञानिक आधार वाली भाषा है ।

हिंदी के क्षेत्र विस्तार हेतु किसी और का मुंह ताकने की अपेक्षा हिंदी प्रेमी स्वयं अपने दायित्व का पूर्ण निष्ठा के साथ निर्वहन करें । विश्व के पांच महाद्वीपों के करोड़ों हिंदी भाषी अंतर्जाल (इंटरनेट ) पर सक्रिय है। वे यदि इस संसार में सही अर्थों में हिंदी पढ़ने लिखने लगें तो हिंदी स्वयं सर्वत्र छा जाएगी अपने कामकाज व्यवहार के लिए हम पराई भाषा पर निर्भर क्यों रहे ।प्रत्येक हिंदी भाषी अपना काम करते हुए हिंदी का स्वयंसेवक बने विश्व भर में हिंदी को सहज अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने में हम अपना योगदान देते रहें ।
संचार क्रांति के इस युग में कंप्यूटर , मोबाइल फोन, टेबलेट व व्हाट्सएप पर हिंदी में काम करना बच्चों का खेल हो गया है । इन साधनों का प्रयोग करते समय हम अपनी हिंदी भाषा का प्रयोग करें क्योंकि राष्ट्रभाषा और मातृभाषा हमारी पहचान को रेखांकित करती है । मातृभाषा से दूरी बनाकर कोई खुद को सही मायनों में जीवित नहीं रख सकता मातृभाषा वह अनिवार्य तत्व है जो हमारी रगों में रक्त की तरह दौड़ता है ।
हिंदी के प्रचार प्रसार में बाल साहित्य भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है इस हेतु हिंदी में अधिकाधिक ऐसे साहित्य का सृजन हो जो कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि के माध्यम से बालकों के मनोरंजन के साथ-साथ उन्हें नैतिक एवं व्यवहारिक शिक्षा भी प्रदान करें और हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो ।

हिंदी विदेश नीति और कूटनीति की भाषा बनें ।शासकीय कामकाज हिंदी में हों, इसके लिए सारी पारिभाषिक शब्दावली से युक्त हिंदी की पुस्तक प्रत्येक विभागीय पुस्तकालय में सबके लिए उपलब्ध होनी चाहिए ।हिंदी शब्दकोश प्राइमरी से लेकर महाविद्यालय , विश्वविद्यालय तक के पुस्तकालयों में अनिवार्य रूप से रखा जाए और इसे पढ़ने के लिए प्रेरित भी किया जाए।हिंदी को रोजगार और बाज़ार की भाषा बनाएं ताकि अधिकाधिक लोग हिंदी के अध्ययन की ओर प्रवृत्त हों ।हिंदी में कहानी कविता नाटक उपन्यास आदि के साथ विज्ञान एवं तकनीकी विषयों पर भी पुस्तकों का निरंतर लेखन हो हिंदी में सॉफ्टवेयर तैयार होते रहें ।

सुखद समाचार यह है कि पुणे के श्री अनुराग गौड और उनके साथियों ने ट्विटर की तर्ज पर हिंदी में काम करने वाला सोशल नेटवर्किंग साइट मूषक हिंदी प्रेमियों के लिए पेश किया है जिसमें शब्दों की सीमा 500 रखी गई है जबकि ट्विटर पर यह सीमा 140 शब्द है। यह बहुत अच्छी बात है कि अधिकाधिक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करें किंतु आवश्यकता इस बात की है कि हम हिंदी की शक्ति – सामर्थ्य को , हिंदी के आकर्षण को , हिंदी की प्रभावोत्पादकता को पहचाने और स्वीकारें । हिंदी पूरे भारत देश को एक सूत्र में बांधकर रखने वाली भाषा है । हिंदी भाषी अपनी भाषा में पूर्ण विश्वास रखें और उसका प्रयोग अधिकाधिक करें। हिंदी के प्रचार प्रसार में निष्ठा पूर्वक योगदान करें ।

उर्मिला देवी उर्मि
साहित्यकार, शिक्षाविद्
रायपुर , छत्तीसगढ़

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