एक मजबूत व्यक्तित्व -गोल्डा मीर

एक मजबूत व्यक्तित्व -गोल्डा मीर

 

दुनिया का इतिहास बहुविविध रहा है। सभ्यता -संस्कृति का विकास भी हर जगह अलग तरीके से हुआ है।आज की विकसित और समृद्ध दुनिया में अनेकानेक महापुरुषों ने हर क्षेत्र मे योगदान दिया है शिक्षा,स्वास्थ्य,सामाजिक और राजनैतिक जीवन में भी।गत 100 वर्ष के इतिहास में आधुनिक विश्व की अवधारणा विकसित हुई है ।जहाँ शांति और युद्ध के अनेकानेक चक्र मिलते हैं।इसमें जय-पराजय ने दुनिया की शक़्ल ही बदल दी। छोटे बड़े देशों में अनेक बदलाव हुए।

यहां यह जानना जरूरी है कि जितना पुरुषार्थ महानायकों ने किया उतना ही महिलाओं ने भी। वे भी कभी पीछे नहीं रहीं। इनमे से एक हैं “गोल्डा मीर” जिन्हें हम ”आयरन लेडी” के रूप में जानते हैं।इज़रायली शिक्षक, राजनीतिज्ञ,प्रखर वक़्ता , साहसी और दूरदर्शी गोल्डा मीर को इससे बेहतर विशेषण क्या दिया जा सकता है? आज का इज़राइल जो दक्षिण पश्चिम एशिया का स्वतंत्र यहूदी राज्य है उसे बनाने में गोल्डा मीर का अथक प्रयास रहा है ।उनका जन्म 3 मई 1898 में यहूदी परिवार में कीव, युक्रेन में हुआ। उनके पिता ब्लूम मबोवीच बेहतर रोजगार के लिए अमेरिका चले गए। गोल्डा मीर अपनी दो बहनों और माँ मोशे के साथ उनके परिवार में रहीं।1 साल बाद पिता ने रेलवे यार्ड में काम किया तब उन्होंने अपने परिवार को 1906 में अपने पास बुला लिया। माँ ने किराने की दुकान चलायी जिसमें किशोरी गोल्डा भी मदद करती थी। गोल्डा की शुरुआती पढ़ाई मिल्वोकी विसकोंसिन में हुई। हाई स्कूल की पढ़ाई के साथ वह काम भी करती थीं।उन्होंने अपनी साथियों के साथ एक संस्था भी बनायी। शुरू से ही नेतृत्व के गुण ने उन्हें और आगे बढ़ाया।वे कुशल वक्ता होने के कारण जल्दी ही राजनीति में आ गयीं।माँ ने जब शादी के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया और वे अपनी बहन शायना के पास चली गयीं।

जहाँ उन्हे साहित्य,यहूदीवाद,व्यापार,संघवाद,महिला मताधिकार जैसे जवलंत मुद्दों पर कहने सुनने का मौका मिला।जिससे उनके अपनी सोच को आकार मिला।उन्हें अपने 2000 वर्ष के यहूदी समुदाय के अस्तित्व पर नाज़ था।जल्द ही वह अपनी बहन से असहमति के बाद अलग हो गयीं।वे युवा आंदोलन /राजनीतिक संगठन के कार्य से जुड़ गयीं। समाजवादी यहूदीवाद की पेरोकार गोल्डा उसकी प्रमुख वक्ता बन गयीं।शुरू में शिक्षिका के रूप में उन्होंने अपना कैरियर शुरू किया।शीघ्र ही वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो गयीं।

1917 में उनका विवाह चित्रकार और समाजवादी मोरिस मेरसन से हुआ। पर अधिक समय तक वे साथ नहीं रहे।उनसे अलगाव के बाद भी उनमें तलाक नहीं हुआ। प्रथम युद्ध के बाद वे 1921 फिलिस्तीन चली गयीं।फिर उनका परिवार भी।जहाँ उन्हें क़ृषि सम्बन्धी छोटे मोटे काम करने पड़े। उनका एक बेटा मेनाकेम और बेटी सारा हुए । कुछ समय वे अमेरिका में राजदूत रहीं।

उनकी नेतृत्व क्षमता पहचान कर उन्हें महिला सचिव चुना गया।और फिर कार्यकारी समिति का सदस्य। यहूदी निर्वासितों के प्रतिनिधिमंडल की भी वे सदस्य रहीं। द्वितीय विश्व युद्ध में उन्होंने अपने देश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।1946 में वे मध्यस्थ वार्ताकार रहीं,जिसने ब्रिटिश और यहूदी समुदाय के बीच बात की। 1947 में फिलस्तीनी शरणार्थियों को देश में आने की राह बनाई । अमरीकी यहूदियों से उन्होंने पर्याप्त धन सँग्रह किया। नए राज्य की स्थापना में धन की जरुरत थी। हर तरह से इज़रायल राज्य की स्थापना में उन्होंने भूमिका निभाई। राजनीति की अनिश्चितता में वे कभी अंदर कभी बाहर कर दी गयीं।उन्हें रूस के मंत्रिमंडल में भी में शामिल किया गया।

उन्हें वहां पद और प्रतिष्ठा तो मिली पर वे अपने देश इज़रायल में ही रहना चाहती थी। इज़रायल स्थापना के घोषणा पत्र में एक अन्य महिला के साथ में उनके हस्ताक्षर हैं। यह गौरव उन्हें मिला।

इज़रायल में 1949 में उन्हें उपप्रधान मंत्री पद प्रस्तावित दिया गया पर उन्होंने मना कर दिया। वे जमीनी काम करना चाहतीं थीं। जब वे श्रम मंत्री बनी तब अप्रवासियों के लिए अस्थायी आवास बनाना एक बड़ी चुनौतीपूर्ण काम था। जिसे उन्होंने पूरा किया।जिन्हें बाद में स्थायी घर दिए गए। विकास, निर्माण, स्वास्थ्य संबधित योजनाओं को साकार किया, जन कल्याण की योजनाएं बनाई और लागू कीं। 1955 में वे तेल अवीब के मेयर के पद के लिए चुनाव लडी,पर महिला होने के कारण उनका विरोध भी हुआ और 2 मत से पीछे रह गयीं।

1956 से 66 तक वे विदेश मंत्री रहीं।तब उन्होंने उपनाम मीर रख लिया जिसका अर्थ है ‘रोशनी’।इस दौरान तक वे स्वेज़ केनल पर विवाद पर हुई वार्ता में भी शामिल हुईं। अफ़्रीकी देशों से सह संबंध भी बनाये। वे मानती थीं कि इज़रायल उनके विकास के लिए रोल मॉडल हो सकता है।

ज्यादा धूम्रपान, कॉफी पीने और व्यायाम में रूचि न होने के कारण उन्हें दिल की बीमारी हो गयी थी और फिर लिम्फमा की बीमारी के कारण वे कुछ समय राजनीति से अलग रहीं । 7 मार्च 1969 को उन्हें प्रीमियर के लिए निर्वाचित किया गया। 3 जून 1974 तक वे इस निर्णायक पद पर रहीं।गठबंधन की इज़रायली पार्टी बना कर उन्होंने शासन किया और बहुमत भी हासिल किया। मध्य-पूर्व में शांति स्थापित करने का कार्य उनकी प्राथमिकता थी।अमेरिका से एक स्थायी शांति समझौता भी किया, और मिश्र से सीमा विवाद भी सुलझाया।जिसने इज़रायल को स्वतंत्र राज्य बना दिया।

1972 के म्यूनिख ओलिंपिक हत्याकांड की तीखी प्रतिक्रिया में उन्होंने ‘मौसाद’ गुप्तचर एजेंसी को हर अपराधी को मौत देने का कठोर आदेश दिया। ‘ ब्लैक सितम्बर’ के नाम से कुख्यात इस हत्याकांड की दुनिया भर में निंदा हुई। खिलाड़ियों की हत्या ने मीर को ही नहीं पूरी दुनिया को विचलित कर दिया था।

1973 में सीरिया के अप्रवासी और युद्ध की आशंका ने इज़रायल को कमजोर कर दिया।

योम कुप्पर युद्ध की समस्या ने आंतरिक कलह को बढ़ा दिया।जीत तो गए पर आरोप यही लगा की सरकार अनुमान क्यों नहीं लगा पायी?संसाधनों की कमी और परस्पर विरोध ने गठबंधन को बहुमत नहीं मिलने दिया तब फिर गोल्ड मीर ने 11 अप्रैल 1974 को स्वयं त्याग पत्र दे दिया।कहा कि गत 5 साल काफ़ी थे उनके लिए।

1975 में उन्होंने आत्म कथा “माई लाइफ” लिखी जो बेस्ट सेलर बन गयी।

1977 में उन्होने ने मिस्र के अनवर सादत की यात्रा के दौरान मतभेदों को दूर करने के लिए बात कर शांति का प्रस्ताव रखा।

भारत से राजनयिक संबंध बहुत बाद में 1992 में हुए पर 1971 के युद्ध में ही गोल्डा मीर ने भारत का अप्रत्यक्ष समर्थन दिया। रूस के दवाब के बावजूद भारत को उन्होंने गोपनीय सैन्य मदद दी और भारत से मैत्री की नींव रखी।आज दोनों देशो के सम्बन्ध मुखर हैं।

8 दिसंबर 1978 को जेरूसलम में कैंसर से उनका देहावसान हो गया। एक मज़बूत इरादे वाली नेता दुनिया से रुख़सत हुई जिन्होंने इज़रायल की नींव रखी और उसे मज़बूत, ताकवर और विकसित देश बनाया।

राष्ट्रवाद और यहूदीवाद,श्रम आंदोलन, तीसरी दुनिया से अच्छे सम्बन्ध बनाना उनकी राजनीतिक समझ का आधार बने।

उन्हें अमरीकी माताओं की ओर से ‘विश्व की माँ’ प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी द्वारा ‘जेम्स मेडिसन ‘और इज़रायल सम्मान दिया गया। उनका नाम कॉलोरोडो महिला हॉल ऑफ़ फेम में दर्ज़ है। उन पर अनेक थिएटर नाटक, टेलीविज़न,फिल्म बनायीं गयी हैं। उनके नाम पर सड़कें,आर्ट स्कूल मेंहटन में स्क्वायर,अनेक स्कूल और संग्रहालय हैं।

गोल्डा मीर का नाम इज़रायल की पहली, दुनिया की तीसरी महिला प्रधानमंत्री के रूप में दुनिया के इतिहास में दर्ज़ है। ” मीर” यानी एक रोशनी जिसने इज़रायल को नई दिशा और स्थान प्रदान किया।

महिमा शुक्ला 

लेखक परिचय –

इंदौर,मध्य प्रदेश की निवासी लेखिका पेशे से प्राध्यापक रही हैं और फिलहाल साहित्य सेवा में समर्पित हैं।शैक्षणिक,साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।संपादन के साथ कवितायें,लघु कथा, निबंध आदि समाचार पत्रों और पुस्तकों में प्रकाशित।रेडियो से विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित।

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