जीवन के अस्मरणीय पल

जीवन के अस्मरणीय पल

समकालीन हिंदी लेखन जगत के एक अग्रणी हस्ताक्षर ममता कालिया जी को कौन नहीं जानता। उनसे मेरा सम्बंध मेरी पहली कहानी ‘वे चार पराँठे‘ से जुड़ा है।यह कहानी जुलाई 2007 में ममता कलिया जी तथा रविंद्र कलिया जी की बिर्मिंघम के एक कहानी कार्यशाला से ऊपजी थी।

कार्यशाला पूरे वीकेंड की थी ।हवाई अड्डे पर ममता जी तथा रविंद्र कलिया जी तो पहुँच गये थे,किंतु उनका सामान नहीं पहुँचा था।बहुत समय खोये सामान की लिखा पढ़ी में लग गया।उन्हें बिना सामान के ही आना पड़ा ।चिंता की बात तो थी क्यूँकि कार्यशाला की सारी सामग्री किताबें,नोट्स इत्यादि उसी समान में था।ममता जी बार -बार कहती रहीं,अगर कार्यशाला की सामग्री हाथ की समान में रखी तो अच्छा रहता।फिर भी उन्हें विश्वाश था कि समान ज़रूर मिल जाएगा । दूसरे दिन रमा जी जो उसी ग्रुप में थीं उनका समान ले कर कार्यशाला में पहुँची ।सब आश्चर्य चकित थे , यह कैसे हो गया । रमा जी ने बताया कि उनका बेटा और बहू भी उसी प्लेन में थे,एक ही रंग के सूटकेस होने के कारण , उन्होंने ग़लती से ममता जी का समान उठा लिया। सभी ख़ुश थे लगा मानो कोई करिश्मा ही हो गया हो , तीन दिन की कार्यशाला बहुत सफल रही।कार्यशाला के पश्चात् ममता जी ने सब को एक कहानी लिखने के लिए कहा ।बात आयी गयी हो गयी ।मेरे लिए कुछ भी लिखना मानो आसमान से तारे तोड़ लाने के जैसा था क्यूँकि इससे पहले मैंने कभी सृर्जनात्मक एक पंक्ति भी नहीं लिखी थी।बस यूँ ही एक दिन मौसम अच्छा था ,अपने गार्डन में बैठे -बैठे मैंने पेंसिल से एक छोटी सी कहानी लिख डाली ।कहानी यूं ही पड़ी रही जब तक भारत नहीं गयी ।क्यूँकि कभी क्रिएटिव एक पंक्ति भी नहीं लिखी थी।सर्दियों में भारत पहुँचते ही मैं ममता जी से मिलने गयी और बहुत झिझकते -झिझकते,हिम्मत तो नहीं हो रही थी फिर भी मैंने उन्हें अपनी कहानी दिखाई ।बड़े प्यार से उन्होंने मेरी कहानी पढ़ ली और शीर्षक देख कर मुसकुरायीं ,‘वे चार पराँठे ‘ कहानी उन्हें बहुत पसंद आयी ,उन्होंने मुझ से पूछा क्या तुम्हारे पास इसकी काॅपी है ? मैंने कहा नहीं। उसी वक़्त उन्होंने पास वाली दुकान से उसकी फ़ोटो काॅपी करा कर मुझे दे दी,और कहानी अपने पास रख ली ।कुछ महीने बीत गये अचानक एक दिन स्कूल से घर पहुँचते देखा मेरी फोन पर लाल लाल बत्ती झिलमिला रही थी ।संदेश सुनते ही बधाइयों का अम्बार लग गया , एक नहीं बीसियों संदेश थे ‘अरूण बधाई हो अभी अभी नया ज्ञानोदय में तुम्हारी कहानी ‘वे चार पराँठे‘ पढ़ी कहानी बहुत ही मार्मिक और धरातल से जुड़ी है।उस दिन से मैं ममता जी की हो गयी और मैं रुकी नहीं ।यूँ कहिये मेरे लेखन का प्रारम्भ ममता जी के प्रोत्साहन से ही हुआ उनकी सराहना का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा ।

उसके पश्चात् हर वर्ष भारत जाने पर ममता जी के घर मेरा आना -जाना लग रहा ।मुझे याद है मेरे ‘ वे चार पराँठे ‘ कहानी संग्रह प्रकाशित होने वाली थी और मैं ममता जी से मिलने गई थी,उसी दौरान उन्होंने बैठे -बैठे ही अपने हाथ से मेरे संग्रह की समीक्षा लिख कर मुझे दे दी।

2019 में जब मैंने सुना ममता जी ‘ क़लम ‘ के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आ रहीं हैं , तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा , शशोपंज में थी उन्हें अकेले में कब मिलूँगी ?कैसे मिलूँगी ? उन्हें समय पर वीज़ा न मिलने के कारण सारा उत्साह मिट्टी में मिल गया ।दो माह पश्चात् पता चला जुलाई में आने वाली हैं । बहुत ख़ुश थी ।एक दिन अचानक ममता जी का फ़ोन आया कि अरुण तुम मुझे 22,23 को accomodate कर सकती हो ?
मैंने उछल कर झट से उत्तर दिया , ज़रूर , यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है ।मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा ।फिर प्रबंधक जी ने मुझे निवेदन किया कि मैं ममता जी को 21 की रात को भी रख लूँ तो लम्बी उड़ान के पश्चात् ममता जी के लिए आसान रहेगा ।मुझे ऐसा लगा मानो मेरी लाटरी निकल गयी हो ।ममता जी का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है । वह 10.30 पहुँची , खुली बाहों से मैंने स्वागत किया । अपने ही घर में उन्हें इतने क़रीब से देखकर विश्वास नहीं हो रहा था । खाने के पश्चात् हम दोनो को ऐसा लगा ही नहीं कि हम लोग पहली बार मिले हैं ।

रात को देर से सोने के कारण सुबह देर से उठे , हल्के से नाश्ते और लंच के बाद डेढ़ बजे पद्मेश जी लेने आ गये ।कार्यक्रम ताज होटल में था।मेहमान समय से पहले आ चुके थे।अरूणा अजितसरिया जी के बेहतरीन साक्षातकार के पश्चात् , ममता जी के कविता संग्रह की हस्ताक्षर प्रति सबको मिली ।इतनी थकावट के बावजूद मैं और ममता जी एक बजे बातें करते रहें।ऐसा लग रहा था मानो दो बिछुड़ी सहेलियाँ बरसों बाद मिली हों।ममता जी ख़ुशी से बार बार कह रहीं थीं , मुझे घर से घर मिल गया है।यही तो उनकी ख़ासियत है, छोटे -बड़े का भेद -भाद न रखते हुए सब पर अपना स्नेह लुटाती हैं ।

22 , तारीख़ को कोवेंट्री से रविंद्र कलिया जी की बहन और बहनोई परिवार सहित आने वाले थे।रात को देर से सोने के पश्चात् भी ममता जी सुबह जल्दी उठ कर बैठ गयीं , बोली नाश्ता हल्का सा बनाना ,मैं सब कुछ खा लेती हूँ।तैयार हो के धूप में बैठी ही थीं की नेपाल के वरिष्ठ साहित्यकार क्रिशन बजगाई उनसे मिलने आ गये ।अभी वे बैठे ही थे तो रविंद्र कलिया जी की बहन , बहनोई जी परिवार सहित पहुँच गये , लगता था रविंद्र कालिया जी के देहांत के पश्चात् पहली बार मिल रहे थे ।रवींद्र जी की बातें होती रहीं । सभी का दुःख साँझा था ।ममता जी और बहन कमलेश जी ने मन भर के रविंद्र जी की बातें कीं ।शाम को कमलेश जी अपना दुःख समेटे चली तो गयीं किंतु ममता जी के घाव को हरा कर गयीं ।
ममता जी अपने बेटों और पोते पोतियों के लिए शोप्पिंग करने के लिए बहुत उत्साहित थीं ।इतनी महान साहित्कार होते हुए भी ममता जी एक माँ और दादी भी थीं।समय कम होने के कारण उसे कल पर टाल दिया।

अब तो दिव्या जी भी पहुँच गयीं थीं । मैं उन्हें खाने के लिए कहीं बाहर ले जाना चाहती थी ।क्षण भर के लिए इंडियन रेस्टोरेंट का ख़्याल आया , फिर सोचा नहीं नहीं , कुछ अलग से होना चाहिये एक दम बिल्कुल नया अनुभव ।
लन्दन की विशेष डीश ‘ फ़िश एंड चिप्स ‘ वह भी पब में ड्रिंक के साथ ।ममता जी भी उत्साहित हो उठी ।पब मेरे घर के पास ही था । अभी ममता जी पब के वातावरण को भीतर सोक ही रही थीं कि एक लोकल लड़की सीमा भी हमारे पास बैठ गयी। वहाँ हम चारों ने बेफ़िक़्र, बेपरवाह बाहर की दुनिया से अनजान , बहुत एंजॉय किया ।घर तो पास ही था , हम चारों भूल गये थे कि हम पढ़ी लिखी प्रोढ़ महिलायें होने के साथ साथ साहित्यकार भी हैं ।ममता जी ख़ुशी से झूमती बोली ‘ ईंट वाज़ एन बरेंड़ न्यू एक्सपिरियनस ऑफ माई लाइफ़ टाइम ‘ । घर पहुँचते दिव्या जी और सीमा जी तो चली गयीं किंतु मेरा और ममता जी का गप्प सेशन बिस्तर में फिर शुरू हो गया । जब में उठने लगीं वह बोलीं ‘ यहीं घुस जाओ बिस्तर में’।उनकी सादगी , सरलता और आत्मीयता मेरे भीतर गहरी होती गयी। मैं तो चली गयी ममता जी मेरी कहानियाँ पढ़ने लगीं ।

23, सुबह आराम से उठीं, नाश्ता किया और कुछ लिखने बैठ गयीं ।मैं चिंतित थी क्यूँकि कब उन्हें कोई बात सताती है तो ममता जी लिखने बैठ जाती हैं । मैंने याद दिलाया कि हमें शोप्पिंग करने भी जाना है।शोप्पिंग के लिए निकलते -निकलते बारह बज गए ।हमने माॅल में कोई दुकान नहीं छोड़ी होगी , उनके पोते के लिए चीज़ें देखी , कुछ पसंद आया कुछ नहीं ।वैसे भी उन्हें सदा जल्दी जल्दी पड़ीं रहती है ,वह अपनी इस कमज़ोरी को मानती हैं ।अब बारी थी उनके बेटों के तोहफ़ों की , बहुत सोचने के बाद यही निष्कर्ष निकला कि उनके लिए आफ़टर शेव लोशन लेंगी ।अब समस्या यह थी कि वह नहीं जानती थीं की उनके बेटे कौन सा लोशन इस्तेमाल करते हैं ।जितने स्टोर में आफ़तर शेव लोशन थे उन्होंने सब सूंघ डाले ।अंत में उन्हें एक जानी पहचानी सुगंध लगी तो बोलीं शायद वह यही लगाते हैं ।अब बारी आयी लिपस्टिक की , उन्होंने दो अपने लिए लीं और दो मेरे लिये , बोलीं यह रंग तुम पर ख़ूब फबेगा ।हमने पूरा दिन शोप्पिंग में बीता दिया कुछ देखा , कुछ ख़रीदा बहुत कुछ नहीं।

24 ,अगले दिन उनकी वापसी थी , फ्लाइट पाँच बजे की थी । जाने से पहले ममता जी ने मुझे एक लिफ़ाफ़ा देते बोली तुम्हारे लिये ….तुम जो चाहो जहाँ चाहो भेज सकती हो । उस लिफ़ाफ़े में ममता जी ने उस रात जो मेरी कहानियाँ पढ़ी थीं उनकी प्रभावशाली सकारात्मक समीक्षा थी । इतना सराहनीय तोहफ़ा देख के मेरी आँखें भर आयीं । बड़े अनमने मन से मैं और दिव्या जी उन्हें फ्लाइट में चढ़ा कर आए ।

अरूणा सब्बरवाल
लंदन, ब्रिटेन

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