अयोध्या:इतिहास के आईने में

अयोध्या:इतिहास के आईने में हे राम, जीवन एक कटु यथार्थ है और तुम एक महाकाव्य ! तुम्हारे बस की नहीं उस अविवेक पर विजय जिसके दस बीस नहीं अब लाखों सर – लाखों हाथ हैं, और विभीषण भी अब न जाने किसके साथ है. इससे बड़ा क्या हो सकता है हमारा दुर्भाग्य एक विवादित स्थल में…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- सर्वपल्ली राधाकृष्णन

सर्वपल्ली राधाकृष्णन 5 सितम्बर को जन्मे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति डा.राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के संवाहक,प्रख्यातशिक्षाविद् लेख़क,महान् दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थै।उनके इन्हीं गुणों के कारण 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था और उन्ही के सम्मान में उनके जन्म दिन 5 सितम्बर को…

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गणतंत्र कैसा ये गणतंत्र

गणतंत्र कैसा ये गणतंत्र गणतंत्र कैसा ये गणतंत्र जहाँ आज भी धर्म पर होते बवाल कई न आज़ादी मंदिर की न आज़ादी मस्ज़िद की न ही गुरुद्वारे गिरजाघर की बंटे धर्म , मज़हब सारे यूँ देश में अपने ही ।। गणतंत्र कैसा ये गणतंत्र जहाँ नहीं महफूज़ लड़की कभी कोख में कभी घर में कभी…

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यू आर माय वैलेंटाइन

    यू आर माय वैलेंटाइन मैं और तुम दो अलग अलग चेहरे दिल शरीर जान आत्मा व्यक्तित्व परिवार दोस्त वातावरण फिर भी हम ऐसे एक दूसरे मे यूं समाहित हुए मेरा सब कुछ हुआ तेरा तेरा सब कुछ हुआ मेरा तेरा मान सम्मान स्वभिमान सुख दुःख सफलता धन सम्पत्ति परिवार जिम्मेदारी हुई मेरी और…

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शून्य से समग्र की ओर

” शून्य से समग्र की ओर “…. इस विराट ब्रह्मांड में हमारे होने का सत्य ही यह जीवन है ।धरती पर बसे हर जीव की अपनी एक कहानी है। संवेदनाओं की अनुभूति गहरे चिंतन के बाद अभिव्यक्ति का वह भास्वर बनती है जहां पारस्परिक एकात्मकता जीवन को मजबूती प्रदान करती है। कहते जिसका जितना समर्पण…

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हिन्दी दिवस : चुनौतियां व प्रोत्साहन

हिन्दी दिवस : चुनौतियां व प्रोत्साहन आजादी के 76 वर्ष पूरे हो गए परन्तु हिन्दी राजभाषा से राष्ट्रभाषा का सफर नहीं तय कर पाई। विविध भाषाओं एवं संस्कृतियों की संगमस्थली भारत में आज की वर्तमान तिथि तक हिंदी जन – जन की भाषा है भी नहीं।कई प्रांतों में उनकी स्थानीय भाषाएं ही जन को जन…

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रानी की गुड़िया

रानी की गुड़िया “अम्मा मेरी गुड़िया गिर गई । अम्मा ट्रक रुकवाओ ना ।” नन्ही रानी बिलखती रही पर ट्रक चल चुका था । लॉक डाउन में पाँच दिन तक रानी अपनी अम्मा के कंधे पर बैठकर जयपुर से आगरा पहुंची थी। जब अम्मा थक जाती तो उसे पहिए वाले सूटकेस पर बिठा देती और…

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एक खामोश घर की आवाज़

एक खामोश घर की आवाज़   घर को खड़ा करने के लिए जितनी ज़रूरत ईंट-पत्थर की होती है, उतनी ही ज़रूरत होती है चुप्पियों की। चुप्पियाँ अक्सर वह आवाज़ होती हैं, जो किसी भी तूफ़ान से अधिक गूंजती हैं। सावित्री ऐसी ही एक चुप्पी थी , गहराई से भरी, स्थिर और सहनशील।   “चुप्पी एक…

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सम्पादकीय

सम्पादकीय सर्वप्रथम गृहस्वामिनी के सुधी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं । ‘गतवर्ष के तजुर्बात हों ,उत्कर्ष में विश्वास हो , गतवर्ष तो एक अंत है,नव वर्ष शुभ शुरुआत हो।’ यह गृहस्वामिनी का आज़ादी विशेषांक है अतः आज़ादी पर ज्ञानवर्धक आलेख एवं सुन्दर कविताओं से यह अंक सुसज्जित है ,और हो भी क्यों न…

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फिर होली में

फिर होली में हुई आहट खोला था जब द्वार मिला त्यौहार । आया फागुन बिखरी कैसी छटा मनभावन। खेले हैं फाग वृन्दावन में कान्हा राधा तू आना। तन व मन भीगे इस तरह रंगों के संग। स्नेह का रंग बरसे कुछ ऐसे छूटे ना अंग। रंगी है गोरी प्रीत भरे रंगों से लजाई हुई। आई…

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