बादलों के संग क्यों उड़ने लगा है मन

बादलों के संग क्यों उड़ने लगा है मन

(१)
बादलों के संग क्यों उड़ने लगा है मन
कल्पना के जाल क्यों बुनने लगा है मन
इन्द्रधनुषी स्वप्न के संग रात भर ,
बीन के तारों सदृस बजने लगा हैं मन ?
हरित वर्णा हो गई है सांवरी धरती ,
बादलों के प्यार ने क्या चातुरी कर दी ?
रिम्झिमी बरसात की बूंदें निरंतर ,
नव प्रणय की भावभीनी अंजुरी भरतीं .
श्रावणी सन्देश लेकर यह घटा ,चमकी
नयन में मानो विरह की ज्वाल सी धधकी ,
यह हवा लाई है क्या संदेश प्रियतम का /
आ गई है याद मानो मिलन के क्षण की .

(२)
क्या संदेशा लाये बादल
क्या सन्देशा लाये बादल,
विकसित सुमन हृदय आंगन में
नव हरीतिमा मन प्रांगण में,
स्मृतियों की बूंदें बरसीं ,
मधुरिम गीत सुनाये पायल
क्या संदेशा लाये बादल !
विरहाकुल मेहा बन नैना ,
शून्य क्षितिज की ओर निहारें,
शरद चन्द्रिका के वितान सा,
पुलकित यह अंतर्मन पागल
क्या संदेशा लाये बादल !
नभ मंडल में चपला नर्तन ,
तमसावृत मेघों का गर्जन ,
स्मृतियों का यह आवर्तन
सिहर उठा विरहिन का आंचल
क्या संदेशा लाये बादल !

(३)
नया सन्देश लेकर !
बरसता है नेह का बादल-
नया सन्देश लेकर !
गूंजती बजती
मिलन की बांसुरी
आस की राधा मचलती बावरी,
भींगता अनुराग का आंचल,
नया सन्देश लेकर !
कौंधती है घन घटा
ज्यों याद पिय की,
चटकी मन में ,
विरह की ज्वाल धधकी ,
बिखरता है रूप का काजल
नया सन्देश लेकर !
श्याम वर्णी बादलों ने ,
गीत क्या गाया ?
सिहरता हर अंग ,
मन का मीत हरषाया ,
झूमता हर द्वार आंगन ,
एक नया सन्देश लेकर !

(४)
यह पावस अमृत हो जाये
धरती के भींगे अंतर में,
नव-स्नेह अंकुरित हो पाए,
और बूंद बूंद नभ कोरों पर,
गीतों की छटा उमड़ जाये.
तुम बरसा दो नव रस कण में,
वह प्रेम गुंजरित हो जाये.
तुम मेघ दूत बन आ जाओ,
मेरा संसार बुलाता है,
रिमझिम बूंदों की तान लिए,
पावस का हास बुलाता है.
तुम छू लो मन के तार आज,
जीवन का राग संवर जाये,
शूलों से बिंध कर भी खिलती ,
कोमल गुलाब की कलिकाएँ,
संघर्षों में भी पलती है,
दुर्गम राहों पर लतिकाएँ.
तुम बनो बांसुरी कान्हा की,
मधुबन की प्रीत मुखर गाये.
गीतों के कोमल स्वर लय पर ,
मेरी कविता के भाव बनो,
अंतर में पलती प्रीति मधुर ,
तुम रसवंती जल-धार बनो,
बूंदों के संग बिखर जाओ
यह पावस अमृत हो जाये .–

पद्मा मिश्रा

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