जन्मकुंडली बनाम मानव चोला

जन्मकुंडली बनाम मानव चोला अद्भुत है यह मानव चोला। और उससे भी अद्भुत हैं यह ज़िंदगी। हमें ज़िंदगी का राज़ पाने के लिए ज़िंदगी को ज़िंदगी से जोड़े रखना होता है। इसी जोड़ के लिए ज्योतिष विज्ञान में जन्मपत्रिका, एक बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य निभाती है। यहाँ कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं- जैसे…

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अब न सहूँगी

अब न सहूँगी मारपीट अब बहुत हो गई ओछी हरकत अब न सहूँगी खौफ़ दिया क्रूर कर्मों से भँडास निकाली जी भर कर रोई मैं चुपचाप अकेले करवट बदली रात-रात भर पर न बहाऊंगी सावन अब बिजली बन कर कड़कूँगी मैं वार किया तो चुप न रहूँगी मारपीट अब बहुत हो गई ओछी हरकत अब…

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THE SEA GETS TOGETHER ME

THE SEA GETS TOGETHER ME The sea gets together me with infinity. He untangles everyone heavy thoughts. They get dressed in my lunar room conceived destinies. And white sheets. I’m not looking for anyone’s consolation. Guardian of Fire send me One Creator. And the bright misfortune is house of my feelings vast. Rozalia Aleksandrova Writer…

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हिंदी पर ग़ज़ल

हिंदी पर ग़ज़ल वतन की आन है हिन्दी , वतन की शान है हिन्दी वतन की आत्मा हिन्दी, वतन की जान है हिन्दी ॥ सरल है व्याकरण इसका ,सरल है लिखने पढ़ने में करें हम काम हिन्दी में,बहुत आसान है हिन्दी ॥ विलक्षण सभ्यता साहित्य का दर्शन कराती है ज़मानेभर में भारत देश की,पहचान है…

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काहे बिहाए बिदेश

काहे बिहाए बिदेश गाँव का चबूतरा जो हमेशा गुलजार रहता था, आज सुनसान है। वहाँ हमेशा एक भीड़ हुआ करती थी, खोमचे वाले, बस पकड़ने वाले, फेरी वाले। सुस्ताने की एक वही जगह थी। पीपल का बड़ा पेड़ और चारों तरफ बड़ा चबूतरा। एक हैंड पम्प भी लगा हुआ है। दरअसल कल ही सरकारी दफ्तर…

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बसंती बंसरी

बसंती बंसरी सुनो-सुनो बंसरी का शोर नाच उठा वन मोर …. सुरों की पिचकारी छुटी भींगा तनमन भींगा जनजन … पीला संयम मन झझ्कोरे सुधि पीये बंजारा .. सुनो सुनो बंसरी का शोर…… नाच उठा मन मोर…. दौड़ चली पीड़ा कल की फिजाओं की तनहाई गीतों के तालों में डोले मन मौसम की शहनाई.. सुनो-सुनो…

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प्रजातंत्र में तंग प्रजा का हाथ है

प्रजातंत्र में तंग प्रजा का हाथ है बलि देहाती, कर्जा वामन लात है प्रजातंत्र में तंग प्रजा का हाथ है आंगुर-आंगुर दाम जोड़ता बीज उधारी कितनी आई ट्रेक्टर का भाड़ा कितना है डीज़ल की कितनी भरवाई गिरवी कटने से पहले उत्पाद है प्रजातंत्र में तंग प्रजा का हाथ है नए आंकड़े, नई रिपोर्टें भूख रेख…

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शार्दुला नोगजा की कविताएँ

शार्दुला नोगजा की कविताएँ     सर्वे सन्तु निरामया! दी रचा स्वर्णिम धरा ने अल्पना ओ समय के रथ ज़रा मद्धम चलो! है सकूरा और जूही की गली ओ सुगन्धा चाँदनी में न जलो!   जैसे पूर्वाभास से भयभीत हो जल छिड़क माँ मंत्र बुद-बुद बोलती मानवों के क्षेम को व्याकुल धरा गाँठ अदरक,  हरिद्रा…

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