आवाज

आवाज राधिका ने एक बार फिर घड़ी देखी। बार-बार घड़ी देखने से समय नहीं बदल जाता। इस फैक्टरी में काम करते हुए चार साल हो गए हैं उसे। यहाँ शर्ट बनते हैं और उसका काम है कॉलर लगाना। जब शुरू में आई थी तब केवल कपड़ों के ढेर को ठीक करती थी। फिर धीरे-धीरे काम…

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प्रेम बंधन

प्रेम बंधन तुमने कम समझा है मुझे या शायद समझने की जरूरत ही नहीं समझी चलो जाने दो इस नासमझी पर भी मुझे तो प्यार ही आया सदा अब तुम समझो, न समझो ये तुम्हारी समझ और तुम्हें समय भी कहाँ समझने समझाने का पर देख लेना, एक दिन अपने दुपट्टे के कोने से बांध…

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हिन्दी मेरी हिन्दी………हिन्दी से हिंदी तक।।।।।।

हिन्दी मेरी हिन्दी………हिन्दी से हिंदी तक।।।।।। देश स्वतंत्र नहीं था तो लोगों के हृदय में राष्ट्र जागरण की भावनाएं हिलोर मारती थी लोग हिन्दी के प्रति समर्पित थे केवल वे परिवार ही जो या तो अंग्रेजों के पिट्ठू थे या अंग्रेजों के द्वारा कराई गई कमाई से मोटे हुए जा रहे थे अंग्रेज़ी पढ़ते थे…

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“रामधारी सिंह “दिनकर”की काव्यगत विशेषताएँ”

“रामधारी सिंह “दिनकर”की काव्यगत विशेषताएँ” स्वतंत्रता से पहले एक विद्रोही कवि और स्वतंत्रता के उपरांत एक राष्ट्रकवि के रूप में स्थापित माने जाने वाले रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, लेखक और निबंधकार हैं।जहाँ उनकी कविताएँ वीर रस, ओज, क्रांति और विद्रोह के स्वरों से भरी हैं, वहीं उनके काव्य में श्रृंगार,सौंदर्य और…

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फ़रिश्ता

फ़रिश्ता सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई सुशीला काफ़ी कमजोर लग रही थी।परन्तु उसकी आँखों में एक अद्भुत चमक थी। वह अपने नवजात शिशु को जो बग़ल के पालने में लेटी थी , उसे ममता से भरी वात्सल्य से एकटक निहार रही थी।उसका पति हरिया उसके पास ही बैठा था।हरिया दिहाडी मज़दूर था। सुशीला…

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तीज के बहाने

तीज के बहाने तीज के बहाने स्त्रियां महीनों पहले से देखने लगती हैं पंचांग करनी होती हैं उसे कई तैयारियां नयी साड़ी, सिंदूर की डिब्बी, बिंदी, चुड़ियां और भी कई सुहाग की निशानियां तीज के बहाने बनाती है परम्परागत पकवान गुजिया ठेकुआ में मिलाती हैं अपने संस्कारों की मिठास फल फूल और पूजा सामग्री से…

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क्षितिज की ओर

क्षितिज की ओर     मुग्ध हो कर देख रहा हूं और बह रहा हूं अस्तित्व की बाढ़ में तेरी अविजित मुस्कान इधर झनझनाती तंत्रियों में शुरू सामूहिक गान।   तू झुलसा रही मेरे अहं को मेरी दुर्बलता को उमड़ रहा न जाने क्या झुकती नज़र, कभी उठती नज़र पर इसके माने क्या? फुलवारी कुछ…

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एमिली डिकेंसन – नई धारा की कवयित्री

एमिली डिकेंसन – नई धारा की कवयित्री “मै कोई भी नहीं, तुम कौन हो क्या तुम भी, कोई नहीं हो ? एमिली डिकेंसन की इस कविता से आशय निकाल सकते हैं कि एमिली बहुत ही अकेली और अपने जमाने में अलग किस्म की कवयित्री रही होंगी । अकेलेपन को उन्होंने अपना साथी बनाया और बहुत…

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