तू सबला है

तू सबला है तेरे आँचल से अमृत पी संसार पनपता खिलता है प्रेम, त्याग उपनाम हैं तेरे गंगा सी सरल सहजता है कर कोटि नमन माँ पन्ना को अपनी शक्ति पहचान ले तू सबला है मान ले ।। लक्ष्मी तू, अन्नपूर्णा तू घर तुझसे ही तो सजता है चट्टानों सी दृढ़ता तुझमें धरती सा धीरज…

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बसंत

बसंत पतझड़ से शोभाहीन हुई, प्रकृति के नव शृंगार को। पिछले बरस की नीरसता हटा, आस के फूल पल्लवित करने को। वन उपवन को पुनर्जीवन देने, है एक और बसंत आने को। अंतर्मन में कहीं सुप्त पड़ी, मानवता झकझोरने को। एहसासों को अंकुरित कर, रिश्तों को नई तरंग देने को। काश, इस बार बसंत आए…

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बदलता होली का स्वरूप

बदलता होली का स्वरूप बिहार में जली थी होलिका………..राख से खेली जाती है होली !! जिंदगी जब सारी खुशियों को स्‍वयं में समेटकर प्रस्‍तुति का बहाना माँगती है तब प्रकृति मनुष्‍य को होली जैसा त्‍योहार देती है। होली हमारे देश का एक विशिष्‍ट सांस्‍कृतिक एवं आध्‍यात्‍मिक त्‍योहार है। अध्‍यात्‍म का अर्थ है मनुष्‍य का ईश्‍वर…

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होली के रंग

होली के रंग चहुँ ओर फैला उल्लास फाल्गुन का ये सुंदर मधुमास होली आयी होली आयी ढोलक-मृदंग सब रस लाई खिले पलाश हैं लाल कोयलिया की कुहू कुहू गान अधरों ने छेड़ी जो तान… मौसम हुआ गुलनार सुखद लगे है बयार रास विलास को लाये होली घन बरसत रंग फुहार उन्मुक्त प्रेम भरे दिलों में…

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सतह की धूप

सतह की धूप नीरजा फूले नहीं समा रही थी। चारों तरफ बधाईयों का तांता लगा हुआ था। ममी – पापा उसे गले लगा के बैठे थे। पूरे जिले में सबसे अच्‍छे नम्‍बर लाकर वह पास हुई थी बारहवीं क्‍लास में। टेबल पर लड्डू के डिब्‍बे रखे थे। किसी ने गले में गेंदे की माला डाल…

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हम तैयार हैं

हम तैयार हैँ सब ठीक ही चल रहा था बस छोटे मोटे उतार – चढ़ाव थे ज़िंदगी गुज़र रही थी कुछ लंबे , कुछ निकट पड़ाव थे कि अचानक सब जम सा गया जीवन का रेला कुछ थम सा गया सब ठिठक गये कुछ सिहर भी गये ये आखिर क्या हो रहा है पृथ्वी खुलकर…

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मैं बोल रही हूँ

मैं बोल रही हूँ शाम के तीन बज चुके थे। सेमिनार खत्‍म होने में एक घंटा और था। स्‍मृति सामने बैठकर सुन रही थी। कमरे में अच्‍छी खासी भीड़ थी। ज्‍यादातर अभी अभी कॉलेज से निकले युवा थे। इस सेमिनार में डॉ.. त्‍यागी, मधुसूदन गुलाटी भाई अग्रवाल और न जाने कितने नामी गिरामी लोग थे।…

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ऊंगली पकड़ कर तुमने….

ऊंगली पकड़ कर तुमने…. साठ के दशक में जन्‍में हम सब एक ऐसी बिरादरी का हिस्‍सा हैं, जो कि न बहुत पुरानी सोच के मोहताज हैं, और न ही बहुत नई तड़क-भड़क में विश्‍वास रखते हैं। और हमारी ऐसी सोच को बनाया, सजाया संवारा और एक रूप रेखा दी है हमारे माता-पिता ने। दहलीज के…

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हमारी हिन्दी

हमारी हिन्दी हिंदी हमारी भाषा हैं। हिंद की परिभाषा हैं। हिन्दी हमारी संस्कृति हैं। संस्कार का सुविचार हैं पहले तो थी दबी-दबी सी। अब सिर ताने खड़ी हैं। सहमी सी हिंदी मेरी। आज सरपट दौड़ रही हैं। राह अपनी खुद बनाती, समृद्ध हो रही भाषा हैं। जुड़ रही है हिन्दी हमारी नई टेक्नोलॉजी से। क्षेत्रों…

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विजयी भारत

विजयी भारत आप में से बहुतों ने १९६२ का युद्ध देखा होगा व उसकी कहानियां भी सुनी होंगी।मेरे भी ज़हन में आज कई दिनों से वो १९७५ का पाकिस्तान व भारत के युद्ध जिसके “सायरन” की गूंज,वो मेरे घर की छत से जहाजों की फर्राटेदार उड़ानें और उस पर हम दोनों बहनों को मां और…

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